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किसी अपने की याद" — कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनकी यादें कभी नहीं जातीं

कभी-कभी ये सिर्फ़ चार शब्द लगते हैं, लेकिन इन चार शब्दों के भीतर एक पूरी दुनिया छिपी होती है। ऐसी दुनिया, जहाँ कुछ अधूरे पल होते हैं, कुछ अधूरी बातें होती हैं, कुछ अधूरे सपने होते हैं और बहुत सारी ऐसी यादें होती हैं, जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता।

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Naresh Bhattarai

04 Aug 2026

⏱ 1 मिनेट 👁 55 💬 0

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किसी अपने की याद में खोया हुआ व्यक्ति
किसी अपने की याद में खोया हुआ व्यक्ति

"किसी अपने की याद..."

कभी-कभी ये सिर्फ़ चार शब्द लगते हैं, लेकिन इन चार शब्दों के भीतर एक पूरी दुनिया छिपी होती है। ऐसी दुनिया, जहाँ कुछ अधूरे पल होते हैं, कुछ अधूरी बातें होती हैं, कुछ अधूरे सपने होते हैं और बहुत सारी ऐसी यादें होती हैं, जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता।

किसी अपने की याद केवल उस इंसान की कमी महसूस करवाती है, ऐसा नहीं है। उसकी याद के साथ वह पूरा समय लौट आता है, जब ज़िंदगी थोड़ी आसान लगती थी, जब मुस्कुराने की वजहें ढूँढ़नी नहीं पड़ती थीं, जब किसी के "कैसे हो?" पूछ लेने भर से पूरा दिन अच्छा हो जाता था।

जब कोई अपना याद आता है, तो सिर्फ़ उसका चेहरा याद नहीं आता।

उसकी आवाज़ याद आती है।

उसकी हँसी याद आती है।

उसकी डाँट भी याद आती है।

उसका चुप रहना भी याद आता है।

वो छोटी-छोटी बातें याद आती हैं, जिन पर कभी ध्यान ही नहीं दिया था। आज वही बातें सबसे ज़्यादा याद आती हैं।

कभी उसके साथ पी हुई चाय...

कभी साथ चलते हुए बिताया गया रास्ता...

कभी बिना किसी वजह के की गई लंबी बातें...

कभी उसकी एक छोटी-सी मुस्कान...

और कभी उसकी आँखों में दिखाई देने वाली वह अपनापन भरी चमक...

समय बीत जाता है, लेकिन ये सब कहीं नहीं जाता।

यादें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बस और गहरी होती जाती हैं।

कई बार लोग कहते हैं—

"समय सब ठीक कर देता है।"

लेकिन शायद समय सब ठीक नहीं करता।

समय सिर्फ़ हमें जीना सिखा देता है।

दर्द वहीं रहता है।

बस हम उसे छिपाना सीख जाते हैं।

हम मुस्कुराना सीख जाते हैं।

लोगों के बीच हँसना सीख जाते हैं।

लेकिन रात के किसी शांत पल में, जब पूरा संसार सो रहा होता है, तब वही यादें धीरे-धीरे दरवाज़ा खटखटाती हैं।

और हम फिर से उसी अतीत में पहुँच जाते हैं।

दुनिया कहती है—

"आगे बढ़ो।"

लेकिन क्या दिल के पास कोई स्विच होता है?

क्या यादों को किसी बटन से बंद किया जा सकता है?

क्या किसी को भूलने का कोई तरीका होता है?

अगर होता, तो शायद दुनिया में इतने टूटे हुए लोग नहीं होते।

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं।

लेकिन उनकी मौजूदगी हमारे भीतर हमेशा रह जाती है।

हम किसी और शहर में चले जाते हैं।

नई नौकरी कर लेते हैं।

नए लोगों से मिल लेते हैं।

नई ज़िम्मेदारियाँ आ जाती हैं।

लेकिन अचानक किसी गाने की धुन...

किसी सड़क का मोड़...

किसी चाय की खुशबू...

या किसी की आवाज़...

हमें वर्षों पीछे ले जाती है।

तब समझ आता है कि इंसान जगह नहीं छोड़ता...

यादें नहीं छोड़ पाता।

सबसे अजीब बात यह है कि हमें केवल वह इंसान याद नहीं आता।

हमें अपने अंदर का वह इंसान भी याद आता है, जो उसके साथ हुआ करता था।

उसके सामने हम जैसे थे...

वैसे शायद आज किसी के सामने नहीं हैं।

हम बिना सोचे हँसते थे।

बिना डरे अपनी बातें कहते थे।

बिना किसी दिखावे के अपने होते थे।

आज हम मुस्कुराते तो हैं, लेकिन पहले जैसी मुस्कान नहीं होती।

बातें तो करते हैं, लेकिन पहले जैसी खुलकर नहीं होतीं।

लोगों से मिलते हैं, लेकिन पहले जैसा अपनापन महसूस नहीं होता।

क्योंकि कुछ लोग सिर्फ़ हमारे जीवन का हिस्सा नहीं होते...

वे हमारी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं।

और जब वे चले जाते हैं, तो लगता है जैसे हमारा भी एक हिस्सा कहीं पीछे छूट गया हो।

यादों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे कभी पूरी तरह मरती नहीं।

वे बस चुप हो जाती हैं।

फिर किसी दिन अचानक लौट आती हैं।

एक तस्वीर देखकर।

एक पुराने संदेश को पढ़कर।

एक तारीख देखकर।

एक खुशबू महसूस करके।

या फिर बिना किसी वजह के।

कई बार हम खुद से कहते हैं—

"अब सब ठीक है।"

लेकिन जैसे ही उनका नाम सामने आता है, आँखें बता देती हैं कि अभी भी सब ठीक नहीं हुआ।

कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।

बस उनकी बातचीत खत्म हो जाती है।

उनका मिलना बंद हो जाता है।

लेकिन दिल में उनके लिए जो जगह होती है, वह कभी खाली नहीं होती।

शायद इसलिए लोग कहते हैं—

"पहला अपनापन कभी पूरी तरह नहीं भूलता।"

लेकिन यह केवल प्रेम की बात नहीं है।

यह माँ की याद भी हो सकती है।

पिता की।

भाई की।

बहन की।

किसी दोस्त की।

किसी गुरु की।

या फिर उस इंसान की, जिसने हमें कभी बिना किसी स्वार्थ के समझा था।

क्योंकि यादें रिश्ते नहीं देखतीं।

वे केवल एहसास पहचानती हैं।

आज की दुनिया बहुत तेज़ हो गई है।

हर कोई व्यस्त है।

हर किसी के पास समय कम है।

लेकिन एक बात आज भी नहीं बदली।

जब दिल किसी अपने को याद करता है, तब दुनिया की कोई भी व्यस्तता उस याद को रोक नहीं सकती।

हम लाख खुद को समझाएँ—

"सब खत्म हो चुका है।"

लेकिन दिल धीरे से कहता है—

"कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते, वे सिर्फ़ हमारी पहुँच से दूर हो जाते हैं।"

शायद इसी का नाम याद है।

याद का मतलब किसी को वापस पाना नहीं होता।

याद का मतलब यह भी नहीं कि हम अतीत में जीना चाहते हैं।

याद का मतलब है—

किसी ने हमारी ज़िंदगी को इतना खूबसूरत बनाया था कि उसके जाने के बाद भी उसकी मौजूदगी महसूस होती है।

अगर आज भी आपको किसी अपने की याद आती है...

तो उसे अपनी कमजोरी मत समझिए।

यह इस बात का प्रमाण है कि आपने कभी किसी को सच्चे दिल से चाहा था।

और सच्चा अपनापन कभी बेकार नहीं जाता।

हो सकता है लोग दूर चले जाएँ।

समय बदल जाए।

परिस्थितियाँ बदल जाएँ।

लेकिन दिल में बसे कुछ लोग कभी पुराने नहीं होते।

वे हर उम्र में उतने ही अपने लगते हैं, जितने पहली बार लगे थे।

अंत में बस इतना कहना चाहता हूँ—

यदि आज आपके जीवन में कोई अपना है...

तो उसके साथ समय बिताइए।

उसे यह मत मानिए कि वह हमेशा आपके साथ रहेगा।

क्योंकि समय कभी रुकता नहीं।

लोग बदल जाते हैं।

रास्ते अलग हो जाते हैं।

और एक दिन ऐसा भी आता है, जब हमारे पास सिर्फ़ तस्वीरें होती हैं, कुछ पुराने संदेश होते हैं और ढेर सारी यादें...

तब समझ आता है कि सबसे कीमती चीज़ इंसान नहीं, उसके साथ बिताया हुआ समय था।

इसलिए अपने लोगों को समय दीजिए।

अपनी भावनाएँ व्यक्त कीजिए।

"कल कह देंगे" सोचते-सोचते कई बार पूरा जीवन निकल जाता है।

और जब कहने की इच्छा सबसे ज़्यादा होती है, तब शायद सामने वह इंसान ही नहीं होता।

क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी छोड़ देते हैं, लेकिन हमारी यादों से कभी नहीं जाते।

और शायद...

यही किसी अपने की याद का सबसे सच्चा अर्थ है।

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